हस्रत-ओ-यास को ले कर शब-ए-ग़म आई है
भीड़ की भीड़ है, तनहाई ही तनहाई है
उल्फ़त के हैं काम निराले
बन बन के बिगड़ जाते हैं
क़िस्मत में न हो तो साथी
मिल मिल के बिछड़ जाते हैं
उल्फ़त के हैं …
( उम्मीदें भी हैं इक सपना
दुनिया में नहीं कुच अपना ) -2
आँसू हैं तो बह जाते हैं
अरमाँ है तो ? जाते हैं
उल्फ़त के हैं …
( आवाज़ उठी है दिल से
बेदर्द ज़माने सुन ले ) -2
कल तू भी उजड़ जायेगा
हम आज उजड़ जाते हैं
उल्फ़त के हैं …