जीना हम को रास ना आया
हम जाने क्यों जीते हैं
क्या सावन, क्या भादो
अपने सब दिन रोते बीते हैं
हम से तो जग रूठ गया है
एक तुम्हारा क्या शिकवा
अब क्यों आहें भरते हैं हम
अब क्यों आँसू पीते हैं
प्यार की बाज़ी आसान समझे
हमने बड़ी नादानी की
दिल की दुहाई देनेवाले
ये बाज़ी कब जीते हैं
दौर-ए-जुनून में क्या क्या सूझी
क्या क्या हमने कर डाला
खुद ही ग़रीबां फाड़ लिया है
खुद ही ग़रीबां सीते हैं